मुबारक दिन Jumu’ah (जुमुआ) पर Surah Al-Kahf की तिलावत करना नबी-ए-करीम ﷺ की मुहब्बत भरी सुन्नत है। यह अमल सिर्फ़ सवाब का ज़रिया ही नहीं बल्कि रूहानी नूर, फ़ितनों से हिफ़ाज़त और गहरी नसीहतों का ख़ज़ाना भी है। क़ुरआन की 18वीं सूरह, अल-कहफ़, चार अहम सच्ची घटनाओं (वाक़यात) को बयान करती है जो इंसानी ज़िंदगी की बड़ी आज़माइशों को समझाती हैं।
1️⃣ दो जुमुओं के दरमियान नूर
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जो शख़्स जुमे के दिन सूरह अल-कहफ़ पढ़े, उसके लिए दो जुमुओं के दरमियान नूर पैदा कर दिया जाता है।”
(सुनन अल-बैहक़ी, अल-हाकिम — मुहद्दिसीन ने सहीह क़रार दिया)
यह “नूर” हिदायत, दिल की रोशनी और गुमराही से बचाव का सबब बनता है। हफ़्ते भर के लिए यह रूहानी उजाला मोमिन की ज़िंदगी को रोशन रखता है।
2️⃣ दज्जाल के फ़ितने से हिफ़ाज़त
सूरह अल-कहफ़ की एक बड़ी फ़ज़ीलत दज्जाल के फ़ितने से बचाव है।
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“जो शख़्स सूरह अल-कहफ़ की शुरू की दस आयतें याद कर ले, वह दज्जाल से महफ़ूज़ रहेगा।”
(सहीह मुस्लिम 809)
कुछ रिवायतों में आख़िरी दस आयतों का भी ज़िक्र है। यानी यह सूरह क़यामत से पहले आने वाले सबसे बड़े फ़ितने से रूहानी ढाल है।
सूरह अल-कहफ़ की अहमियत — चार सच्चे वाक़यात और उनके सबक
अल्लाह तआला ने इस सूरह में जो चार घटनाएँ बयान की हैं, वे इंसान की चार बड़ी आज़माइशों को समझाती हैं।
1️⃣ अस्हाब-ए-कहफ़ — ईमान की आज़माइश
(क़ुरआन 18:9-26)
कुछ नौजवानों ने ज़ुल्म व शिर्क वाले माहौल से अपना ईमान बचाने के लिए ग़ार (कहफ़) में पनाह ली। अल्लाह ने उन्हें कई साल सुला कर महफ़ूज़ रखा।
सबक:
जब ईमान ख़तरे में हो, तो अल्लाह पर भरोसा और कुर्बानी इंसान को कामयाब करती है।
2️⃣ दो बाग़ों वाला शख़्स — दौलत की आज़माइश
(क़ुरआन 18:32-44)
एक अमीर आदमी को दो ख़ूबसूरत बाग़ दिए गए, मगर वह घमंड में आ गया और आख़िरत का इंकार करने लगा। नतीजा — अल्लाह ने उसके बाग़ तबाह कर दिए।
सबक:
दौलत नेमत है, मगर घमंड उसे तबाही में बदल देता है। शुक्र और तवाज़ो ही हिफ़ाज़त हैं।
3️⃣ हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और ख़िज़्र — इल्म की आज़माइश
(क़ुरआन 18:60-82)
अल्लाह के नबी Musa (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के बंदे Khidr से इल्म हासिल करने का सफ़र किया। कुछ काम उन्हें ज़ाहिर में ग़लत लगे, मगर बाद में उनकी हिकमत खुली।
सबक:
इंसानी इल्म सीमित है। अल्लाह की हिकमत हर चीज़ के पीछे काम कर रही होती है — सब्र और तवाज़ो ज़रूरी है।
4️⃣ ज़ुलक़रनैन — क़ुदरत व हुकूमत की आज़माइश
(क़ुरआन 18:83-98)
अल्लाह ने Dhul-Qarnayn को बड़ी सल्तनत दी। उन्होंने इंसाफ़ क़ायम किया, मज़लूमों की मदद की और याजूज-माजूज से बचाव के लिए दीवार बनाई।
सबक:
ताक़त और हुकूमत अमानत है — सही इस्तेमाल इंसाफ़ और ख़िदमत में है, न कि ज़ुल्म में।
चारों वाक़यात का मुश्तरका पैग़ाम
ये चारों कहानियाँ इंसान की बड़ी आज़माइशों को बयान करती हैं:
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ईमान — अस्हाब-ए-कहफ़
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दौलत — दो बाग़ों वाला शख़्स
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इल्म — मूसा व ख़िज़्र
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ताक़त — ज़ुलक़रनैन
हर जुमुआ इन्हें पढ़ना हमें याद दिलाता है कि इन फ़ितनों का मुक़ाबला कैसे करना है।
गुनाहों की माफ़ी
उलमा ने बयान किया कि जुमे के दिन सूरह अल-कहफ़ पढ़ना दो जुमुओं के दरमियान के छोटे गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया भी बनता है, बशर्ते तौबा और नेक आमाल साथ हों।
ख़ुलासा
सूरह अल-कहफ़ सिर्फ़ तिलावत की सूरह नहीं — यह ज़िंदगी का रूहानी रोडमैप है:
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ईमान पर इस्तिक़ामत
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दौलत में तवाज़ो
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इल्म में सब्र
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ताक़त में इंसाफ़
हर जुमुआ इसकी तिलावत मोमिन की दुनिया और आख़िरत दोनों को रोशन कर देती है।

