अस्वीकरण (Disclaimer)
इस लेख का एकमात्र उद्देश्य रसूलुल्लाह ﷺ के मुक़द्दस दर्जे के प्रति जागरूकता पैदा करना और ईमान वालों को किसी भी अनजानी या अनचाही बेअदबी से बचाना है।
यह लेख शिक्षा के लिए है, न कि मुसलमानों के बीच फूट, नफ़रत या वैमनस्य पैदा करने के लिए।
📖 पहला पन्ना: बात क्या थी?
ज़माना था 1800-1900 का। भारत में नई छापाखाने लगे थे, किताबें छपने लगी थीं। इससे बहुत से नए विचार भी फैले। कुछ लोगों ने नई किताबें लिखीं। इन किताबों में पैगंबर मुहम्मद ﷺ की शान, उनके इल्म (ज्ञान) और मर्तबा (दर्जा) के बारे में कुछ ऐसी बातें लिख दी गईं, जो पुराने मुसलमान आलिमों को बिल्कुल ठीक नहीं लगीं। ये आलिम बहुत परेशान हुए।
उनमें से एक थे इमाम अहमद रज़ा खान। वह बरेली के रहने वाले थे और बड़े आलिम थे। उन्होंने देखा कि कुछ लोग पैगंबर ﷺ के दर्जे को लेकर ऐसी बातें लिख रहे हैं जो सीधे-सीधे इस्लाम के बुनियादी अक़ीदे (विश्वास) के खिलाफ़ हैं। उन्होंने इसका जवाब दिया—एक फतवा लिखा। यह फतवा सिर्फ़ एक राय नहीं था। बाद में मक्का-मदीना के बड़े आलिमों ने भी इसे सही ठहराया।
यह लेख बताएगा:
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उन किताबों में आख़िर लिखा क्या था?
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उसे ख़तरनाक क्यों माना गया?
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फतवा कैसे बना और हरमैन के आलिमों ने क्यों कहा कि यह ठीक है?
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सबसे बड़ी बात—कुरआन और सहाबा-ताबेईन इन बातों के बारे में क्या कहते हैं?
ध्यान रहे: यह लेख लड़ाई झगड़े के लिए नहीं, बल्कि समझने के लिए है। बस पैगंबर ﷺ की शान का ख़्याल रखना सिखाना है।
📜 दूसरा पन्ना: सुन्नियों का बुनियादी विश्वास – पैगंबर ﷺ का ‘अदब’
सुन्नी मुसलमान ये मानते हैं कि हमारे आका ﷺ सिर्फ़ एक अच्छे इंसान नहीं हैं। आप ﷺ की हालत बिल्कुल अलग है। आप ﷺ खुदा की तरफ से चुने हुए आख़िरी नबी हैं।
कुछ ज़रूरी बातें:
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आप ﷺ सारी मखलूकात में सबसे अफ़ज़ल (बेहतरीन) हैं।
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आप ﷺ का इल्म (ज्ञान) खुदा की तरफ से दिया हुआ है। यह हमारे जैसे आम इंसान के इल्म से बिल्कुल अलग किस्म का है।
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आप ﷺ के बारे में बोलने या लिखने में बहुत एहतियात (सावधानी) की ज़रूरत है। कोई ऐसी बात जो चाहे गलती से ही सही, आप ﷺ के दर्जे को थोड़ा भी कम दिखाए, वह बहुत बड़ा गुनाह है।
एक अहम नियम: अक़ीदे (विश्वास) के मामले में सिर्फ़ इंसान का इरादा नहीं देखा जाता। बल्कि देखा जाता है:
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उसके बोले हुए शब्द (लफ़्ज़)
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उन शब्दों से निकलने वाला मतलब (लाज़िम), भले ही लिखने वाले का वह मतलब न रहा हो।
मिसाल: अगर कोई कहे, “राजा और चपरासी दोनों ही इंसान हैं।” यह बात सही है। लेकिन अगर कोई कहे, “राजा और चपरासी हक़ीकत में बराबर हैं,” तो यह गलत है। क्योंकि इसका लाज़िम मतलब यह निकलता है कि दोनों का दर्जा एक है। ठीक इसी तरह का फर्क पैगंबर ﷺ के बारे में बात करने में भी है।
⚠️ तीसरा पन्ना: वो तीन मशहूर बातें जिन पर फतवा हुआ
फतवा किसी की शख्सियत पर नहीं, बल्कि लिखी हुई बातों पर हुआ। यहाँ वो तीन मशहूर बातें हैं:
1. इस्माइल देहलवी की किताब ‘तहज़ीरुन नास’ से
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उन्होंने लिखा (मोटा मतलब): “नबी और बुजुर्गों (वली) में फर्क सिर्फ़ दर्जे (मर्तबा) का है। हक़ीकत में दोनों बराबर हैं।”
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आलिमों ने क्यों आपत्ति की?
सुन्नी अक़ीदे में नबूवत (पैगंबरी) और विलायत (वली होना) दो अलग-अलग चीज़ें हैं। नबूवत खास मुकाम है। यह बात नबूवत के खास मुकाम को खत्म करके उसे विलायत की एक ऊँची सीढ़ी बना देती है। इसका मतलब यह हुआ कि पैगंबर ﷺ और किसी बड़े वली में हक़ीकत में कोई फर्क नहीं—बस नाम का फर्क है। यह कुरआन और सुन्नत के खिलाफ़ है।
2. अशरफ अली थानवी की किताब ‘हिफ़्ज़ुल ईमान’ से
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उन्होंने लिखा (मोटा मतलब): “अगर ग़ैब (गुप्त) के इल्म को चौड़े मतलब में लें, तो बच्चे, पागल और जानवर भी इस इल्म में शामिल होंगे।”
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आलिमों ने क्यों आपत्ति की?
यहाँ मसला ग़ैब के इल्म को सीमित करना नहीं था। मसला था तुलना का तरीका। पैगंबर ﷺ के खुदा-दीदा इल्म की बात करते हुए बच्चों, पागलों और जानवरों का ज़िक्र करना बेअदबी है। इससे पैगंबर ﷺ के इल्म की तुच्छता (छोटापन) जाहिर होती है। पैगंबर ﷺ के बारे में ऐसी बेइज़्ज़त करने वाली मिसालें देना गलत है, भले ही लिखने वाले का इरादा कुछ और रहा हो।
3. खलील अहमद सहारनपुरी की किताब ‘बराहीन-ए-क़ातिया’ से
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उन्होंने लिखा (मोटा मतलब): “शैतान को कुछ ऐसी बातों का इल्म है जो रसूल ﷺ को नहीं है।”
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आलिमों ने क्यों आपत्ति की?
यह बात सबसे ज़्यादा खतरनाक मानी गई। इसमें सीधे-सीधे लानत के काबिल शैतान के इल्म की तुलना पैगंबर के इल्म से की गई। इसका मजबूरन यही मतलब निकलता है कि पैगंबर ﷺ का इल्म कहीं न कहीं कम है। सुन्नी अक़ीदे में यह सोचना भी गुनाह है कि एक लानतित मखलूक के पास वह इल्म हो सकता है जो खुदा के नबी ﷺ के पास न हो। इसे साफ तौर पर कुफ्र कहा गया।
याद रखने वाली बात: इस्लामी कानून में एक बात है—“कुफ्र साफ लफ़्ज़ और साफ लाज़िम (मतलब) से साबित होता है।”
यानी, बात का फैसला उसके शब्दों और उनसे निकलने वाले मतलब से होगा, न कि लिखने वाले के बाद में दिए गए बहानों से।
📖 चौथा पन्ना: कुरआन क्या कहता है? सीधी आयतें
आलिमों ने जो कहा, वह बेबुनियाद नहीं था। उनकी बात की जड़ कुरआन में है। खुदा ने अपने नबी ﷺ के साथ बात करने का तरीका बताया है।
आयत 1: आवाज़ न बुलंद करो (सूरा अल-हुजुरात, 49:2)
“ऐ ईमान वालो! नबी की आवाज़ से ऊपर अपनी आवाज़ मत उठाओ और न ही उनसे वैसे जोर से बात करो जैसे तुम आपस में एक-दूसरे से करते हो। ऐसा न हो कि तुम्हारे अमल बर्बाद हो जाएँ और तुम्हें खबर भी न हो।”
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सीख: यह आयत मुसलमानों को कह रही है। सिर्फ़ आवाज़ ऊँची करने से ही अमल बर्बाद हो सकते हैं। तो फिर शब्दों से पैगंबर ﷺ के दर्जे को कम करने वाली बात कितनी बड़ी गलती होगी?
आयत 2: एक शब्द ‘राइना’ मत कहो (सूरा अल-बक़रा, 2:104)
“ऐ ईमान वालो! ‘राइना’ मत कहो, बल्कि ‘उन्ज़ुरना’ कहो और ध्यान से सुनो। काफिरों के लिए दर्दनाक अज़ाब है।”
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सीख: ‘राइना’ का एक मतलब तो ठीक था (“हम पर नज़र रखो”)। लेकिन यहूदी इसका मजाक उड़ाते थे। खुदा ने पूरा शब्द ही बदलवा दिया। यह साबित करता है कि पैगंबर ﷺ के लिए शब्दों का चुनाव बहुत मायने रखता है। अच्छे इरादे से भी गलत शब्द इस्तेमाल नहीं हो सकता।
आयत 3: नबी को आम आदमी की तरह मत पुकारो (सूरा अन-नूर, 24:63)
“तुम नबी को पुकारने को अपने आपस के पुकारने जैसा मत बनाओ…”
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सीख: सिर्फ़ पुकारने के तरीके में ही अंतर रखने का हुक्म है। तो फिर दर्जे और इल्म में बराबरी का दावा कैसे ठीक हो सकता है?
सबसे बड़ी बात: खुदा ने भी नबी ﷺ को नाम से नहीं पुकारा!
कुरआन में दूसरे नबियों को खुदा नाम से पुकारा:
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“या आदम” (ऐ आदम!) – 2:35
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“या नूह” (ऐ नूह!) – 11:46
लेकिन हमारे नबी ﷺ को हमेशा इज्जत के लफ्ज़ों से पुकारा:
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“या अय्युहन नबी” (ऐ नबी!) – 8:64
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“या अय्युहर रसूल” (ऐ अल्लाह के रसूल!) – 5:41
सोचो: अगर खुदा भी अपने प्यारे नबी ﷺ को नाम लेकर नहीं, बल्कि उनके ऊँचे मुकाम वाले नाम से पुकारता है, तो हम आम इंसानों को क्या हक है कि हम आप ﷺ के बारे में हल्की-फुल्की या कम करके बात करें?
🤲 पाँचवाँ पन्ना: सहाबा और पहले आलिम क्या करते थे?
कुरआन की बातें सहाबा (पैगंबर के साथी) ने जी कर दिखाईं। उनका रवैया हमारे लिए मिसाल है।
सहाबा किराम (रज़ी अल्लाहु अन्हुम) का हाल:
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वह पैगंबर ﷺ के सामने आवाज़ धीमी कर देते थे।
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ज़्यादा देर तक सीधी निगाह से नहीं देखते थे, एहतराम (इज्जत) से।
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वह आपस में बहस करते थे, लेकिन कभी भी पैगंबर ﷺ के दर्जे या इल्म के बारे में कोई शक या तुलना नहीं करते थे।
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किसी सहाबी से यह कहते हुए कोई रिवायत (कथन) नहीं मिलती कि “पैगंबर हक़ीकत में हम जैसे हैं” या “शैतान को कुछ ऐसा आता है जो पैगंबर को नहीं आता।”
ताबेईन (सहाबा के बाद वालों) का हाल:
वह सहाबा से भी ज़्यादा डरते थे कि कहीं पैगंबर ﷺ के बारे में गलत बात न निकल जाए। उनके लिए ज़बान पर कंट्रोल रखना बहुत ज़रूरी था।
चारों इमामों का रवैया:
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इमाम अबू हनीफा: वह “अगर नबी ﷺ न होते…” जैसे जुमले भी नहीं कहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह कम एहतरामी है।
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इमाम मालिक: वह मदीना में सवारी नहीं करते थे, ताकि उस ज़मीन का एहतराम रहे जहाँ पैगंबर ﷺ दफन हैं। उन्होंने कहा, “मैं उस ज़मीन पर आवाज़ कैसे बुलंद कर सकता हूँ जहाँ अल्लाह के रसूल ﷺ हैं?”
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इमाम शाफ़ई: उन्होंने कहा, “जो शख्स रसूल ﷺ के बारे में लापरवाही से बोलता है, वह अपना दीन खुद बर्बाद करता है।”
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इमाम अहमद बिन हंबल: उन्होंने कहा, “हम रसूल ﷺ के बारे में क़ियास (तर्क/तुलना) नहीं करते।”
नतीजा: पैगंबर ﷺ के बारे में बात करने में पूरी एहतियात और एहतराम की परंपरा कुरआन से लेकर सहाबा, ताबेईन और चारों इमामों तक चली आई है। ऊपर बताई गई तीनों बातें इस पूरी परंपरा में कहीं नहीं मिलतीं। यानी, यह नई चीज़ें थीं।
🕋 छठा पन्ना: इमाम अहमद रज़ा का तरीका और हरमैन की मंजूरी
इमाम अहमद रज़ा खान ने जल्दबाज़ी नहीं की।
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उन्होंने किताबों से शब्द-दर-शब्द वो बातें निकालीं जिन पर एतराज था।
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पुराने हनफी और सुन्नी नियमों के मुताबिक उन बातों का मतलब निकाला।
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फर्क किया: उन्होंने कहा कि हम बात (लफ़्ज़) पर फतवा दे रहे हैं, शख्स के दिल पर नहीं। शख्स की नीयत अल्लाह जाने।
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सबसे अहम काम: उन्होंने यह सब सबूत इकट्ठा करके मक्का और मदीना के बड़े आलिमों के पास भेज दिए। यह इसलिए किया ताकि कोई यह न कहे कि यह सिर्फ़ भारत का झगड़ा है।
हरमैन के आलिमों से पूछने की वजह:
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वह दूर के (अरब के) थे, भारत के झगड़ों से अलग।
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वह दुनिया भर के मुसलमानों के लिए इज्जत वाले थे।
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अगर वह भी मान लेते, तो फिर कोई यह न कह पाता कि फतवा सिर्फ़ किसी एक गिरोह या जगह की राय है।
हरमैन के आलिमों का जवाब:
मक्का के मुफ़्ती सैय्यद अहमद दहलान समेत कई बड़े आलिमों ने इमाम अहमद रज़ा के फतवे को दुरुस्त ठहराया। उन्होंने कहा:
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उन बातों में कुफ्र का मतलब निकलता है।
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उन बातों पर कुफ्र का फतवा शरई तौर पर सही है।
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यह मसला लफ़्ज़ और मतलब का है, किसी से दुश्मनी का नहीं।
इस मंजूरी को किताब “हुसामुल हरमैन” (दो हरम की तलवार) में लिखा गया। इससे फतवे को और ताकत मिली।
✅ आखिरी पन्ना: सबक और नतीजा
यह पूरा मामला किसी से नफरत या बदला लेने के लिए नहीं था। यह सिर्फ़ शब्दों, उनके मतलब और उनसे होने वाले नुकसान को रोकने के लिए था।
जब हम सब कुछ एक साथ रखते हैं:
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कुरआन की सख्त हिदायतें पैगंबर ﷺ के साथ बात करने के लिए।
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सहाबा का प्यार और एहतराम भरा रवैया।
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पहले आलिमों का डर कि कहीं पैगंबर ﷺ के बारे में गलत बात न निकल जाए।
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फिर नई किताबों में लिखी गई वो बातें जो पूरी परंपरा के उलट थीं।
तो एक ही नतीजा निकलता है: इमाम अहमद रज़ा खान और हरमैन के आलिमों ने जो किया, वह पैगंबर ﷺ की इज्जत बचाने के लिए ज़रूरी कदम था।
तकफ़ीर (कुफ्र का फतवा): यहाँ ‘तकफ़ीर’ का मतलब यह नहीं था कि फलाँ आदमी हमेशा जहन्नुम में जाएगा। बल्कि मतलब था कि फलाँ बात कुफ्र की बात है। इंसान का अंजाम अल्लाह के हाथ में है। लेकिन बात गलत है, यह बताना हमारा फर्ज़ है।
आज के लिए सबक:
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पैगंबर मुहम्मद ﷺ के बारे में बोलने और लिखने में बहुत सावधानी ज़रूरी है।
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हमें उनकी शान में कोई कमी नहीं आने देनी चाहिए, चाहे बहस के चक्कर में ही क्यों न हो।
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इस मामले में पुराने आलिमों का डर और एहतियात ही सही रास्ता है।
आखिरी बात:
पैगंबर ﷺ के मामले में, ज़रा सी सावधानी भी ‘कट्टरपन’ नहीं, बल्कि ईमान की शर्त है।

