कुरान - 2:108 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

أَمۡ تُرِيدُونَ أَن تَسۡـَٔلُواْ رَسُولَكُمۡ كَمَا سُئِلَ مُوسَىٰ مِن قَبۡلُۗ وَمَن يَتَبَدَّلِ ٱلۡكُفۡرَ بِٱلۡإِيمَٰنِ فَقَدۡ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ

अनुवाद -

"क्या तुम अपने रसूल (मुहम्मद ﷺ) से वैसे ही सवाल करना चाहते हो जैसे पहले मूसा से किया गया था? [213] और जो कोई ईमान को कुफ़्र से बदल दे, वह यक़ीनन सीधी राह से भटक गया है। [214]"

सूरह अल-बक़रा आयत 108 तफ़सीर


[213] शरारत भरे सवाल और गुस्ताख़ी

  • यहूदियों ने रसूलुल्लाह ﷺ से माँग की कि पूरा क़ुरआन एक ही बार में नाज़िल कर दिया जाए।
  • इस पर अल्लाह ने फ़रमाया कि ये माँग वैसी ही है जैसी उनके बाप-दादा ने हज़रत मूसा (अ.स) से की थी —
    "हमें अल्लाह को आमने-सामने दिखाओ"।

🔍 इससे दो बातें सामने आती हैं:

  1. शरारत और हठ से भरे सवाल करना मना है — ये ग़लत नीयत को दिखाते हैं।
  2. नेक लोगों से बेमतलब या तौहीन वाले सवाल करना — ये बेदबी (disrespect) है।

🗣️ सबक़:
कम बोलो, ज़्यादा अमल करो — क्योंकि ज़्यादा बोलने वाले अक्सर अमल से खाली होते हैं।

[214] ग़लत सवालात गुमराही की तरफ़ ले जाते हैं

  • जो सवाल इरादतन बेअदबी या कुफ़्र की तरफ़ ले जाएं,
    वो सिर्फ़ बेमतलब नहीं, बल्कि गुनाह हैं।
  • यहूद की आदत थी कि वो:
    • रसूल ﷺ से फ़रमाइश करते: "पूरा क़ुरआन एक साथ नाज़िल करो"
    • हज़रत मूसा से कहते: "हमें अल्लाह को सामने दिखाओ"

➡️ ऐसे तकब्बुर वाले रवैये इस्लाम में नापसंद हैं।

👉 जो शख़्स ईमान को कुफ़्र से बदल लेता है, यानी ग़लत सोच और अहंकार के चलते हक़ को ठुकराता है —
वो सीधे रास्ते से दूर चला जाता है, चाहे उसकी बातें कितनी भी "अक़्लमंदी" जैसी क्यों न लगें।

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