कुरान - 2:162 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

خَٰلِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنۡهُمُ ٱلۡعَذَابُ وَلَا هُمۡ يُنظَرُونَ

अनुवाद -

162. "वे उस जगह में हमेशा के लिए रहेंगे। न तो उनके लिए सज़ा कम की जाएगी [341], और न ही उन्हें कोई राहत दी जाएगी [342]।"

सूरह अल-बक़रा आयत 162 तफ़सीर


[341] "सज़ा कम नहीं होगी..."

  • इस आयत से हमें पता चलता है कि काफ़िरों की सज़ा शुरू से अंत तक एक जैसी और बिना किसी कमी के रहेगी।
  • उनका दर्द और यातना लगातार और बिना आराम के जारी रहेगा।
  • यह बिलकुल अलग है मुमिनों की सज़ा से, जिनकी सज़ा में अल्लाह की रहमत से कुछ राहत या कमी आ सकती है।

👉 सबक़: सच्चे ईमान वालों की हालत और काफ़िरों की हालत में बहुत बड़ा फ़र्क़ होता है।

[342] "ना उन्हें राहत दी जाएगी, ना मोहलत..."

  • इस आयत से साफ़ है कि काफ़िरों को न तो मौत के बाद किसी तरह की राहत मिलेगी, और न ही कोई मोहलत या मौका मिलेगा।
  • मतलब यह कि उनकी सज़ा में कोई टाल-मटोल या इंतजार की गुंजाइश नहीं है।
  • मौत के बाद उनकी हालत में सुधार की संभावना बहुत कम या नहीं के बराबर है।

👉 हालांकि, कुछ खास मामलों में अल्लाह की रहमत से अपवाद हो सकते हैं, जैसे हदीस में बताया गया कि अबू लहब को कुछ राहत मिलती है।

निष्कर्ष: यह आयत हमें काफ़िरों की सज़ा की सख्ती का एहसास दिलाती है, और दुनिया में ईमानदारी के साथ रहना और तौबा करते रहना कितना जरूरी है।

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