कुरान - 2:188 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

وَلَا تَأۡكُلُوٓاْ أَمۡوَٰلَكُم بَيۡنَكُم بِٱلۡبَٰطِلِ وَتُدۡلُواْ بِهَآ إِلَى ٱلۡحُكَّامِ لِتَأۡكُلُواْ فَرِيقٗا مِّنۡ أَمۡوَٰلِ ٱلنَّاسِ بِٱلۡإِثۡمِ وَأَنتُمۡ تَعۡلَمُونَ

अनुवाद -

188. और न खाओ आपस में एक-दूसरे का माल नाहक़ तरीके से [426], और न पहुँचाओ उसे (रिश्वत के तौर पर) हाकिमों (जजों या हुकूमत वालों) तक ताकि तुम लोगों के माल का कुछ हिस्सा गुनाह के साथ खा सको [427], जबकि तुम जानते हो (कि यह हराम है) [428]।

सूरह अल-बक़रा आयत 188 तफ़सीर


[426] नाहक़ तरीके से दूसरों का माल खाना

हराम तरीकों से कमाई मना है:
इस आयत का पहला हिस्सा बताता है कि दूसरे का माल नाजायज़ तरीके से लेना या खाना हराम है। इसमें शामिल हैं:

  • धोखा, चोरी, झूठे सौदे
  • हराम पेशे जैसे जुआ, शराब, सिनेमा, बेहयाई (नाच-गाना), या दाढ़ी मुंडवाने जैसे कामों से कमाना
  • बिना हक़ के किसी का माल लेना, भले वो ज़बान या क़ानून के सहारे लिया जाए, इस्लाम में मना है

👉 अल्लाह ने साफ़ कहा कि माल सिर्फ़ हलाल तरीके से कमाया और खाया जाए।

[427] रिश्वत और ग़लत तरीकों से फैसला लेना

रिश्वत देना और लेना — दोनों गुनाह हैं:
इस हिस्से में हुकूमत या अदालत तक रिश्वत पहुँचाने की मुमानअत (मनाही) है ताकि:

  • कोई झूठा फैसला करवाकर किसी का हक़ छीन सको
  • ग़लत तरीके से किसी का माल हड़प सको
  • अपनी बात मनवाने के लिए सच को झूठ और झूठ को सच बना दो

रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "रिश्वत देने वाला और लेने वाला — दोनों जहन्नम के हक़दार हैं।"

👉 इस आयत में रिश्वत के ज़रिए सिस्टम में करप्शन फैलाने से मना किया गया है।

[428] जानते हुए गुनाह करना

इल्म के साथ गुनाह — बड़ा गुनाह:
अल्लाह ने कहा कि तुम जानते हो ये हराम है, फिर भी ऐसा करते हो।
यानी:

  • इल्म होते हुए गुनाह करना — ज़्यादा सख़्त सज़ा वाला होता है
  • ये बात क़ाबिले-गौर है कि "न जाने से माफ़ी" मिल सकती है, लेकिन "जानकर गुनाह" — सीधा नाफरमानी है
  • इसमें अदालतों में झूठी गवाही, फर्ज़ी वकील, ग़लत सलाह देकर पैसा लेना — सब शामिल हैं

👉 इसलिए मुसलमान को चाहिए कि अपने हर अमल में सचाई, अमानतदारी और हलाल रोज़ी को तरजीह दे।

📚 सारांश:

इस आयत में अल्लाह ने हमें दूसरे का माल हराम तरीके से खाने, रिश्वत देने या लेने, और झूठे फैसले करवाकर किसी का हक़ छीनने से रोका है — खासतौर पर जब हम जानते हों कि ये गुनाह है।
इसका मक़सद है कि समाज में इंसाफ, अमानत और परहेज़गारी को कायम किया जाए।

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