20. ऐसा लगता है कि बिजली उनकी आँखों की रौशनी छीन लेगी [37]। जब भी कुछ चमकता है तो उसमें चल पड़ते हैं, और जब अंधेरा होता है तो वहीं रुक जाते हैं। और अगर अल्लाह चाहता तो उनकी सुनने और देखने की ताक़तें छीन लेता। बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है [38]।
मुनाफ़िक़ हमेशा रूहानी तौर पर अंधे और बहरे रहते हैं,
ये उनके बुरे आमाल (कामों) की वजह से है।
👉 फिर भी अल्लाह ने उनकी सारी इंद्रियाँ बिल्कुल नहीं छीनी —
क्योंकि दुनिया का निज़ाम अल्लाह की मर्ज़ी से चलता है,
ना कि अपने आप।
👉 जब भी हक़ की रौशनी (चमक) दिखाई देती है — जैसे कोई फायदा या आसानी — तो वो आगे बढ़ते हैं।
लेकिन जब मुसीबत या क़ुर्बानी की बात आती है,
तो वो वहीं खड़े रह जाते हैं,
कंफ़्यूज़ (भ्रमित) होकर,
चलने की हिम्मत नहीं होती।
👉 उनका हिदायत की तरफ़ चलना सिर्फ मौक़ापरस्ती होता है —
सच्चा यक़ीन नहीं।
आख़िर में जो जुम्ला है:
"बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है",
इसका मतलब यह है कि —
जो कुछ भी अल्लाह की मर्ज़ी और हिकमत में हो सकता है,
वो सब करने की पूरी ताक़त अल्लाह के पास है।
👉 इसका मतलब बिलकुल नहीं कि अल्लाह कोई झूठ या गलती कर सकता है —
ऐसी बातें अल्लाह की शान के ख़िलाफ़ हैं।
👉 इस आयत से उन गलत सोचों की सख़्त तरदीद (इन्कार) होती है,
जैसे ये कहना कि अल्लाह झूठ बोल सकता है (माअाज़ अल्लाह)।
ये गहरी अक़ीदे की गलती है।
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सूरह अल-बक़रा आयत 20 तफ़सीर