कुरान - 2:205 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِي ٱلۡأَرۡضِ لِيُفۡسِدَ فِيهَا وَيُهۡلِكَ ٱلۡحَرۡثَ وَٱلنَّسۡلَۚ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلۡفَسَادَ

अनुवाद -

205,. "और जब वह मुड़ता है, तो ज़मीन में भागदौड़ करता है ताकि उसमें फ़साद फैलाए, और खेती और इंसानों को बर्बाद कर दे। और निःसंदेह, अल्लाह फ़साद को पसंद नहीं करता।"

सूरह अल-बक़रा आयत 205 तफ़सीर


[205] पीठ पीछे फ़साद फैलाना — दोहरा मिज़ाज

  • यह आयत उस मुनाफ़िक़ (पाखंडी) के बारे में बताई जा रही है जो रसूल ﷺ के सामने मीठी बातें करता है, लेकिन जब वह मुड़ कर चला जाता है, तो ज़मीन में फ़साद फैलाता है
  • "मुड़ता है" यानी जब वह सच्चे लोगों से दूर हो जाता है, तो उसका असली किरदार सामने आता है।
  • वह भागदौड़ करता है, यानी हर तरफ दौड़ता है, लेकिन नेक काम के लिए नहीं, बल्कि बुराई और तबाही के लिए।

खेती और इंसानी ज़िंदगी को तबाह करता है

  • उसकी हरकतों से समाज का अर्थतंत्र (रिज़्क़, खेती) और इंसानियत दोनों को नुकसान पहुँचता है।
  • "खेती" का मतलब है — वो तमाम ज़रिया जिनसे लोग रोज़ी कमाते हैं, जैसे खेत, कारोबार वग़ैरह।
  • "नस्ल" यानी इंसानी ज़िंदगियाँ — उन्हें भी वह या तो मारता है या उनका जीवन मुश्किल बना देता है।

अल्लाह को फ़साद पसंद नहीं

  • यह वाज़ेह (स्पष्ट) बात है कि अल्लाह ऐसा फ़साद, तबाही, धोखा और नुक़सान बिल्कुल भी पसंद नहीं करता।
  • चाहे कोई ज़ुबान से कितनी भी मीठी बातें करे, अगर उसके अमल (काम) ऐसे हैं कि वे दूसरों को नुकसान पहुँचाएँ, तो वह अल्लाह की नज़र में मुजरिम (अपराधी) है।
  • इस आयत का सीधा पैग़ाम यह है कि दोहरी ज़िंदगी, धोखा, और तबाही फैलाना अल्लाह की नाराज़गी का कारण बनता है।

सबक़:

👉 जो लोग दिखावे में अच्छे लगते हैं लेकिन असल में समाज को नुक़सान पहुँचाते हैं, वे अल्लाह के नज़दीक बदतर इंसान हैं।
👉 इस आयत से हमें सीख मिलती है कि हमें लोगों को उनकी बातों से नहीं, उनके कामों से पहचानना चाहिए।

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