कुरान - 2:231 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

وَإِذَا طَلَّقۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغۡنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمۡسِكُوهُنَّ بِمَعۡرُوفٍ أَوۡ سَرِّحُوهُنَّ بِمَعۡرُوفٖۚ وَلَا تُمۡسِكُوهُنَّ ضِرَارٗا لِّتَعۡتَدُواْۚ وَمَن يَفۡعَلۡ ذَٰلِكَ فَقَدۡ ظَلَمَ نَفۡسَهُۥۚ وَلَا تَتَّخِذُوٓاْ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ هُزُوٗاۚ وَٱذۡكُرُواْ نِعۡمَتَ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ وَمَآ أَنزَلَ عَلَيۡكُم مِّنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَٱلۡحِكۡمَةِ يَعِظُكُم بِهِۦۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ

अनुवाद -

231. और जब तुम महिलाओं को तलाक़ दे दो और उन्होंने अपनी मियाद पूरी कर ली हो, तो या तो उन्हें दया और अच्छे तरीके से रोक लो या अच्छे तरीके से रिहा कर दो [553]। और उन्हें किसी दुश्मनी या अत्याचार के लिए रोक मत लो [554]। और जो ऐसा करेगा, वह अपनी ही ज़िंदगी पर ज़ुल्म करेगा [555]। और अल्लाह की आयतों का मज़ाक मत उड़ाओ [556], और अल्लाह का एहसान याद करो, जो उसने तुम पर किया और जो किताब और हिकमत उसने तुम्हारे लिए भेजी है ताकि वह तुमको सलाह दे [557]। और अल्लाह से डरो, और जान लो कि अल्लाह सभी चीज़ों का जानकार है [559]।

सूरह अल-बक़रा आयत 231 तफ़सीर


[553] महिला को दया और सम्मान के साथ छोड़ना या रखना

  • जब एक महिला अपनी इद्दत (वेटिंग पीरियड) पूरी कर लेती है, तो पति के पास दो विकल्प होते हैं:
    • वह तलाक़ को वापस ले सकता है पुनर्संयोजन और दया के उद्देश्य से।
    • या फिर वह उसे सम्मान और दया के साथ रिहा कर सकता है, जो कि तलाक़ का तीसरा और अंतिम निर्णय हो सकता है।
  • किसी भी स्थिति में, पत्नी को जबरदस्ती या दबाव डालकर रोकना या उसे हानी पहुँचाना निषिद्ध है।

[554] हानी पहुँचाने के लिए रोकना निषिद्ध है

  • इस आयत में स्पष्ट किया गया है कि पति को अपनी पत्नी को इद्दत के दौरान इस उद्देश्य से नहीं रोकना चाहिए:
    • ताकि इद्दत की मियाद बढ़ाई जा सके।
    • उसे शारीरिक या मानसिक शोषण का शिकार बनाया जा सके।
    • या किसी प्रकार की नफरत या बदला लेने के लिए उसे रोकने का प्रयास किया जाए।
  • केवल पुनर्संयोजन या पत्नी के भले के लिए उसे रोकना जायज़ है।

[555] जो किसी का हक मारे, वह खुद पर जुल्म करता है

  • आयत यह चेतावनी देती है कि जो शख्स तलाक़ की प्रक्रिया का दुरुपयोग करके अपनी पत्नी को हानि पहुँचाता है, वह अपनी ही ज़िंदगी पर ज़ुल्म कर रहा है
  • इसका मतलब यह है कि यदि तलाक़ की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया जाए, तो इसका नुक़सान व्यक्ति को ही होता है, क्योंकि वह ग़लत रास्ते पर चलकर अपना ही नुकसान कर रहा है।

[556] अल्लाह की आयतों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए

  • यहाँ पर यह कहा गया है कि अल्लाह की आयतों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए और इन्हें हंसी का कारण नहीं बनाना चाहिए।
  • यदि तलाक़ और विवाह की प्रक्रियाओं का मजाक किया जाए या इनका दुरुपयोग किया जाए, तो यह अल्लाह के कानूनों का अपमान होगा।
  • इस प्रकार का व्यवहार आध्यात्मिक हानि का कारण बनता है, क्योंकि यह अल्लाह के आदेशों का उल्लंघन है।

[557] अल्लाह के एहसान का ध्यान रखना

  • इस आयत में मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि अल्लाह का बड़ा एहसान उनके ऊपर है, विशेष रूप से उस किताब (कुरआन) और हिकमत (हदीस) के रूप में जो उन्हें जीवन के सही मार्ग पर चलने की सलाह देती है।
  • मुसलमानों को अल्लाह के आशीर्वाद और तवज्जो को याद रखना चाहिए और इन्हें कृतज्ञता से देखना चाहिए।

[558] कुरआन और हदीस दोनों अल्लाह की दिशा हैं

  • आयत में "किताब" से कुरआन और "हिकमत" से हदीस का उल्लेख किया गया है।
  • यह दिखाता है कि कुरआन और हदीस दोनों ही अल्लाह की दिशा हैं और मुसलमानों को इन दोनों से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।
  • यह दोनों धार्मिक ज्ञान के मुख्य स्रोत हैं और मुस्लिम समुदाय को इन्हें सही तरीके से समझकर जीवन में लागू करना चाहिए।

[559] अल्लाह से डरना – वह सब जानता है

  • अंत में यह कहा गया है कि मुसलमानों को अल्लाह से डरना चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि अल्लाह सभी चीज़ों का जानकार है
  • जो व्यक्ति यह जानता है कि अल्लाह हर काम को देखता और जानता है, वह अपने कृत्यों को सही तरीके से करेगा और ग़लत कामों से बचने की कोशिश करेगा।
  • सच्चा विश्वास और अल्लाह का डर व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

सारांश:
इस आयत में तलाक़ और पुनर्संयोजन की प्रक्रिया में सम्मान और दया को बनाए रखने की हिदायत दी गई है। तलाक़ के बाद, महिला को आत्याचार या शोषण से बचाना चाहिए और उसे सम्मानपूर्वक छोड़ा जाना चाहिए। इसके अलावा, मुसलमानों को अल्लाह की आयतों का सम्मान करने, उनके एहसानों को याद रखने और सच्चे डर और श्रद्धा के साथ जीवन जीने की सलाह दी गई है।T

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