[35] और हमने कहा: "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो [68], और उसमें से जहाँ चाहो खुब खाओ, मगर इस पेड़ के पास न जाना [69], वरना तुम ज़ालिमों में से हो जाओगे [70]।"
इस हुक्म से कुछ अहम बातें सामने आती हैं:
जन्नत पहले से मौजूद थी, और उसके फल और नेमतें उस समय भी मयस्सर थीं — ये क़यामत के बाद की जन्नत नहीं थी।
हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का वहाँ रहना किसी इनाम के तौर पर नहीं था, बल्कि एक तर्बियत और तैयारी का मरहला था। उन्हें धरती पर ख़लीफ़ा बनना था, और यह जन्नती अनुभव एक सबक़ और तैयारी का हिस्सा था।
इस दौर में उनकी पत्नी हव्वा अलैहिस्सलाम उनके साथ थीं — हूरों का वहाँ कोई ज़िक्र नहीं है।
यह जन्नत में रहना अस्थाई था, असल मक़सद धरती पर उतरना और वहाँ अल्लाह के क़ानूनों को लागू करना था।
इस आयत में अल्लाह के हुक्म, मंशा और मंज़ूरी के फर्क को समझना ज़रूरी है:
हुक्म वाज़ेह था — “इस पेड़ के पास न जाना।”
लेकिन अल्लाह की मंशा यही थी कि आदम अलैहिस्सलाम उस पेड़ के क़रीब जाएं, ताकि इसके ज़रिए उनका धरती पर आना मुकम्मल हो।
इसलिए इस अमल की आख़िरी मंज़ूरी अल्लाह की तरफ़ से थी।
चूंकि आदम अलैहिस्सलाम उस समय शरीअत के मुकल्लफ़ (पाबंद) नहीं थे, इसलिए यह अमल किसी शरीअती गुनाह के ज़ेर में नहीं आता।
यहाँ “ज़ालिमों” से मुराद शिर्क या ज़ुल्म-ओ-सितम नहीं है, बल्कि भूल या ग़लती है।
किसी नबी को "ज़ालिम" कहना अगर उससे इन्कार या तौहीन के तौर पर हो, तो वह कुफ़्र है, क्योंकि नबी मासूम होते हैं।
अगर कोई नबी ख़ुद अपने लिए ऐसा लफ़्ज़ इस्तेमाल करे, तो वह इज़्हारे आज़िज़ी (विनम्रता) के तौर पर होता है।
और जब अल्लाह ऐसा कहे, तो वह मालिक होने के नाते कहता है — मगर आम इंसान को यह हक़ नहीं कि किसी नबी के लिए ऐसा अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करे, क्यूंकि इससे उनकी अजमत को ठेस पहुँचती है।
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सूरह अल-बक़रा आयत 35 तफ़सीर