[36] फिर शैतान ने उन दोनों को वहाँ से फिसला दिया [71], और उन्हें उस जगह से निकाल दिया जहाँ वो थे। और हमने कहा: "उतर जाओ (तुम सब) [72], एक-दूसरे के दुश्मन बनकर। और तुम्हारे लिए धरती में एक ठहरने की जगह और एक तय वक़्त तक रोज़ी का इंतज़ाम है।" [73]
इस वक़्त तक शैतान जन्नत से निकाला जा चुका था, लेकिन उस पर जन्नत में आने-जाने की पाबंदी नहीं लगी थी।
उसी रास्ते से उसने आदम अलैहिस्सलाम और बीबी हव्वा को धोखा दिया।
इससे यह सबक़ मिलता है कि अगर एक मासूम नबी को भी शैतान धोखा दे सकता है, तो आम इंसान को तो और भी ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है।
शैतान की चालें बहुत महीन और लगातार होती हैं — इसलिए हर वक़्त अल्लाह से पनाह माँगते रहना ज़रूरी है।
यह हुक्म सिर्फ़ हज़रत आदम और हव्वा के लिए नहीं था, बल्कि उनकी पूरी औलाद के लिए भी था — जो उस वक़्त उनकी पीठ में मौजूद थी।
कुछ उलमा का मानना है कि आदम का उतरना उनकी औलाद की वजह से हुआ — जिनमें से कुछ लोग नाफरमान और काफ़िर होने वाले थे।
अगर आदम अलैहिस्सलाम जन्नत में ही रहते, तो ऐसे लोग वहीं पैदा होते — जो जन्नत जैसी पाक जगह के लिए मुनासिब नहीं होते।
इसलिए अल्लाह ने उन्हें धरती पर भेजा, ताकि नेक और बद का अलगाव हो सके।
"तुम सब" कहने से यही कुल औलाद शामिल होती है।
"तुम एक-दूसरे के दुश्मन हो" — इसका इशारा ज़्यादा तर इंसानों के आपसी झगड़ों की तरफ़ है, क्यूंकि आदम अलैहिस्सलाम के दिल में किसी के लिए दुश्मनी नहीं थी।
रिवायतों के मुताबिक़, हज़रत आदम को भारत के एक पहाड़ पर उतारा गया, और बीबी हव्वा को जद्दा में — बाद में दोनों की मुलाक़ात अल्लाह की रहमत से हुई।
धरती को एक अस्थाई ठिकाना बताया गया — यहाँ रहना, जीना, और रोज़ी कमाना मुमकिन है — मगर "एक तय वक़्त" तक, यानी मौत तक।
असल मक़सद यह है कि इंसान यहाँ इम्तिहान दे और तज़किया (पाक़ीज़गी) हासिल करके फिर से जन्नत में लौटे।
यह दुनिया एक टेस्ट है — जहाँ से गुज़र कर ही इंसान अपने असल मक़ाम यानी जन्नत का हक़दार बनता है।
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सूरह अल-बक़रा आयत 36 तफ़सीर