कुरान - 2:64 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

ثُمَّ تَوَلَّيۡتُم مِّنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَۖ فَلَوۡلَا فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ وَرَحۡمَتُهُۥ لَكُنتُم مِّنَ ٱلۡخَٰسِرِينَ

अनुवाद -

[64] फिर उसके बाद तुम फिर गए। अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़्ल (कृपा) और उसकी रहमत (दया) न होती, तो तुम ज़रूर घाटा उठाने वालों में से हो जाते। [119]

सूरह अल-बक़रा आयत 64 तफ़सीर


[119] अल्लाह की रहमत और फ़ज़्ल का मतलब क्या है?

इस आयत में अल्लाह के फ़ज़्ल (बड़ा इनाम) और रहमत (मेहरबानी) का मतलब यह हो सकता है:

  1. तौबा (पश्चाताप) की तरफ़ हिदायत देना – यानी अल्लाह ने उन्हें मौका दिया कि वो अपने गुनाहों से लौट आएं।
  2. अज़ाब (सज़ा) को टाल देना – यानी अल्लाह ने फ़ौरन सज़ा नहीं दी, बल्कि उन्हें मोहलत दी।
  3. हज़रत मुहम्मद ﷺ की इस दुनिया में आमद – अगर प्यारे नबी ﷺ ना आते, और लोग उनके ज़रिए अल्लाह की पनाह ना पाते, तो ये दुनिया नष्ट कर दी जाती।

🔹 इसलिए साफ़ है कि रसूलुल्लाह ﷺ खुद अल्लाह की रहमत और सबसे बड़ा इनाम हैं।
🔹 उनके आने से ही उम्मत को बचने का रास्ता मिला और अल्लाह की नाराज़गी से पनाह मिली।

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