[65] और यक़ीनन तुम उन्हें जानते हो जिन्होंने सब्त (शनिवार) के बारे में हुक्म तोड़ा [120]। तो हमने उनसे कहा: "हो जाओ बंदर, [121] रुसवा किए गए।”
सूरह अल-बक़रा आयत 65 तफ़सीर
[120] सब्त के दिन नाफ़रमानी का गुनाह
यह घटना आइला नामक जगह की है जो मदीना और सीरिया के बीच लाल सागर के किनारे पर स्थित था।
हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) के ज़माने में यहूदी क़ौम को हुक्म था कि शनिवार को कोई शिकार न करें।
लेकिन उन्होंने चालाकी से दरिया के किनारे गड्ढे बनाए, ताकि मछलियाँ शनिवार को फँस जाएँ और फिर वो उन्हें रविवार को निकाल लें।
यह धोखेबाज़ी वाला काम 70 साल तक चलता रहा — और फिर अल्लाह का अज़ाब (सज़ा) उन पर आ गया। 🔹 इससे पता चलता है कि छोटा गुनाह भी अगर बार-बार और लगातार किया जाए, तो वो बड़ा गुनाह बन जाता है।
[121] बंदर बना दिए गए — लेकिन रूह नहीं बदली
अल्लाह ने उन लोगों को सज़ा में उनके चेहरे बंदरों जैसे बना दिए।
लेकिन उनके जिस्म और रूह (आत्मा) इंसानों जैसी ही रही।
इस से यह साबित होता है कि यह कोई रूह की तब्दीली (transmigration) नहीं थी।
यह आयत आत्मा के पुनर्जन्म (reincarnation) के झूठे विचार को खारिज करती है।
सूरह अल-बक़रा आयत 65 तफ़सीर