[85] फिर वही तुम हो जो एक-दूसरे को मारते हो और अपने लोगों के एक समूह को उनके घरों से निकालते हो, पाप और ज़्यादती में एक-दूसरे की मदद करते हो [156]। और अगर वे तुम्हारे पास क़ैदी बनकर आते हैं, तो तुम उन्हें छुड़ाते हो, हालाँकि उन्हें निकालना तुम पर हराम था। तो क्या तुम किताब के कुछ हिस्से पर ईमान लाते हो [157], और कुछ को नकारते हो? फिर तुममें से जो ऐसा करते हैं, उनके लिए दुनिया की ज़िंदगी में रुसवाई के सिवा क्या बदला हो सकता है [158]? और क़यामत के दिन उन्हें सबसे सख़्त अज़ाब की ओर लौटाया जाएगा। और अल्लाह उस से बेख़बर नहीं जो तुम करते हो [159]।
तौरेत में साफ़ मना किया गया था कि एक-दूसरे को ना मारो और अपने ही लोगों को घरों से ना निकालो। लेकिन बनी इस्राईल आपस में लड़ते, निकालते, फिर जब वही लोग क़ैदी बनते तो उन्हें छुड़ाते। यह दोहरी नीति थी।
ईमान लाने का मतलब है पूरे धर्म और उसके सभी आदेशों को मानना। किसी हिस्से को मानना और किसी को नहीं—यह मुनाफ़िक़त और बड़ा गुनाह है।
ऐसे लोगों के लिए दुनिया में ज़िल्लत और शर्मिंदगी का अंजाम है। जैसे बनी क़ुरैज़ा और बनी नज़ीर को नष्ट किया गया—यह सब अल्लाह की चेतावनी के अनुसार हुआ।
चाहे कोई छुपा कर करे या खुल्लमखुल्ला—हर अमल अल्लाह की नज़र में है। उसी के मुताबिक सज़ा या इनाम मिलेगा।
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सूरह अल-बक़रा आयत 85 तफ़सीर