कुरान - 2:89 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

وَلَمَّا جَآءَهُمۡ كِتَٰبٞ مِّنۡ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٞ لِّمَا مَعَهُمۡ وَكَانُواْ مِن قَبۡلُ يَسۡتَفۡتِحُونَ عَلَى ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ فَلَمَّا جَآءَهُم مَّا عَرَفُواْ كَفَرُواْ بِهِۦۚ فَلَعۡنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلۡكَٰفِرِينَ

अनुवाद -

[89] और जब उनके पास अल्लाह की ओर से एक किताब आई, जो उस (तौरेत) की पुष्टि करती थी जो उनके पास थी [165], और वे इससे पहले काफिरों के मुकाबले फतह की दुआ किया करते थे [166], फिर जब वह चीज़ उनके पास आ गई जिसे वे पहचानते थे [167], तो उन्होंने उसका इनकार कर दिया। तो अल्लाह की लानत है इनकार करने वालों पर [168]।

सूरह अल-बक़रा आयत 89 तफ़सीर


[165] क़ुरआन पुरानी किताबों की पुष्टि करता है

इस आयत में "पुष्टि करती थी" से मुराद है कि क़ुरआन ने तौरेत और इंजील जैसी पहले उतरी किताबों की सच्चाई और उनके अल्लाह की तरफ से होने की तसदीक की। इन किताबों में आख़िरी नबी ﷺ के आने की बशारतें मौजूद थीं, जो क़ुरआन के आने से पूरी हो गईं।

[166] पहले नबी ﷺ के वसीले से फतह मांगते थे

यहूद और नसरानी जब काफ़िरों से जंग करते, तो नबी आख़िरज़माँ ﷺ के नाम का वसीला देकर अल्लाह से फतह की दुआ करते थे, और अल्लाह उन्हें इस वसीले से फतह भी देता था। लेकिन जब वही नबी ﷺ हक़ीक़त में आए, तो इन लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर दिया।

[167] नबी को पहचानने के बावजूद इंकार किया

पिछली किताबों में नबी ﷺ की खूबियाँ और पहचान के निशानात साफ़ दर्ज थे। वे उन्हें अपने इल्म और किताबों की रौशनी में अच्छी तरह पहचानते थे, लेकिन इसके बावजूद घमंड और हसद के चलते इनकार कर बैठे।

[168] इंकार करने वालों पर अल्लाह की लानत

यहाँ अल्लाह की लानत वसीले पर नहीं, बल्कि नबी ﷺ के इनकार पर है। जो लोग पहचानने के बाद भी नबी ﷺ को नहीं मानते, उन पर अल्लाह की लानत होती है।

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