[91] और जब उनसे कहा जाता है: "उस चीज़ पर ईमान लाओ जो अल्लाह ने नाज़िल की है," [172] तो वे कहते हैं: "हम तो बस उसी पर ईमान लाते हैं जो हम पर नाज़िल किया गया।" और जो उसके अलावा आया है, उसे झुटलाते हैं, हालाँकि वह सच्चाई है, और उस (किताब) की तस्दीक़ करता है जो उनके पास है [173]। कह दीजिए (हे मुहम्मद): "फिर क्यों तुम पहले अल्लाह के पैग़म्बरों को क़त्ल करते थे, [174] अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो?"
इस आयत से साफ़ होता है कि हर मुसलमान पर यह फ़र्ज़ है कि वह:
क़ुरआन सच्चाई है और वह पहले आई किताबों की तस्दीक़ करता है। मगर अब जिन किताबों और नबियों का ज़िक्र क़ुरआन में नहीं है, उनका सही इल्म हमारे पास नहीं है। इसलिए अब क़ुरआन ही आख़िरी और महफूज़ मयार है जो बीती किताबों और नबियों की सच्चाई की गवाही देता है।
इस आयत से यह भी साबित होता है कि किसी नबी की बेअदबी या उन्हें क़त्ल करना खुला कुफ्र है। और जो लोग उन नबियों के क़ातिलों की ताईद करते हैं या उन्हें इज़्ज़त देते हैं, वो भी इसी गुनाह में शरीक हैं। जैसे आज के यहूदी उन लोगों को इज़्ज़त देते हैं जिन्होंने नबियों को क़त्ल किया — इसलिए वो भी गुनाहगार हैं। जिस तरह नेकियों के साथ देने पर सवाब मिलता है, उसी तरह कुफ्र की ताईद करना भी कुफ्र ही होता है।
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सूरह अल-बक़रा आयत 91 तफ़सीर