सारी तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं [4], जो सारे जहानों का पालनहार है [5]।
"अल-हम्दु लिल्लाह" का वाक्य बहुस्तरीय अर्थ रखता है।
यदि इसमें "अल" को संपूर्णता दर्शाने वाला (comprehensive article) माना जाए, तो इसका अर्थ यह होगा: हर प्रकार की तारीफ़ — चाहे वह ज़ुबान से हो, दिल में महसूस की जाए, या किसी दृश्य को देखकर हो — वह सब असल में अल्लाह के लिए ही है।
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान (رحمة الله عليه) फ़रमाते हैं:
“मख़लूक़ की हर तारीफ़ दरअसल ख़ालिक़ की ही तारीफ़ है।”
उदाहरण के तौर पर:
यदि "अल" को केवल निर्दिष्ट (definite article) समझा जाए, तो इसका अर्थ यह होगा:
“वही तारीफ़ें अल्लाह को स्वीकार हैं, जो पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की शिक्षा के अनुसार की गई हों।”
तफ़्सीर रूहुल बयान के अनुसार:
“काफ़िरों द्वारा की गई तारीफ़, चाहे वह कितनी भी कवित्वपूर्ण या भव्य हो, अल्लाह के नज़दीक मक़बूल नहीं, क्योंकि उसमें इख़लास (निष्ठा) और नबवी मार्गदर्शन नहीं होता।”
हालाँकि अल्लाह सारे जहानों का रब्ब (पालनहार) है, लेकिन मोमिन को चाहिए कि वह अल्लाह का ज़िक्र अदब के साथ करे।
तफ़्सीर में बताया गया है:
यह सिखाता है कि:
निष्कर्ष:
इस आयत में यह स्पष्ट किया गया कि हर तारीफ़ का असली हक़दार सिर्फ़ अल्लाह है, और वह ही हर दुनिया का पालनहार है। लेकिन, हमारी नज़रों में वह सबसे बढ़कर इसलिए है क्योंकि वह हमारे प्यारे नबी ﷺ का रब्ब है — यही सच्ची मुहब्बत और इमान की निशानी है।
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सूरह अल-फ़ातिहा आयत 2 तफ़सीर