अरबी शब्द "द्वाल" के पाँच अर्थ हैं:
काफ़िर या गुमराह होना (Infidel or One Who Has Gone Astray)
उदाहरण: "उन लोगों में से नहीं जो तेरे गुस्से के हकदार हुए, और न ही जो गुमराह हुए" (सूरह अल-फातिहा: आयत 7)।
अज्ञात या अजनबी (Unaware or Stranger)
उदाहरण: "(हज़रत मूसा ने कहा): 'मैंने यह काम किया था जब मैं अज्ञात था'" (सूरह अश-शुअरा: आयत 20)।
मोहब्बत में पागल होना (Infatuated)
उदाहरण: "बच्चों ने कहा: 'अल्लाह की क़स्म! तुम वही पुरानी मोहब्बत में पागल हो'" (सूरह यूसुफ: आयत 95)।
अपने ख्यालों में खो जाना (Lost in One’s Own Thoughts)
उदाहरण: "पानी दूध में खो जाता है।"
पहचान का प्रतीक (A Symbol of Identification)
एक ऊँचा पेड़ या ऊँगी इमारत, जो यात्री को रास्ता दिखाने के लिए प्रतीक के रूप में कार्य करती है।
पहला अर्थ (काफ़िर या गुमराह होना) (The First Meaning: Infidel or Astray)
यह अर्थ यहाँ लागू नहीं होता, क्योंकि अल्लाह ने स्पष्ट रूप से कहा है:
"तुम्हारा साथी न गुमराह हुआ, न ही वह गुमराह था" (सूरह अन-नजम: आयत 2)।
मक्का के काफ़िर भी नबी ﷺ को गुमराह या पापी नहीं मानते थे, हालाँकि वे उन्हें शायर, जादूगर या पागल कहते थे।
दूसरा अर्थ (अज्ञात या अजनबी होना) (The Second Meaning: Unaware or Stranger)
यह अर्थ भी लागू नहीं होता, क्योंकि नबी ﷺ किसी भी धार्मिक या अच्छे कार्य में अज्ञात नहीं थे।
नबी ﷺ पहले से ही इत्तिकाफ और इबादत में लगे हुए थे, और पहली वाही (व revelations) से पहले और इसरा और मीराज की यात्रा के दौरान नमाज़ पढ़ा करते थे।
राह दिखाने का प्रतीक (Symbol of Guidance)
नबी ﷺ को एक मार्गदर्शन के प्रतीक के रूप में माना जाता है, जैसे एक ऊँचा पेड़ या ऊँगी इमारत जो यात्रा करने वालों के लिए रास्ता दिखाती है।
नबी ﷺ सर्वोत्तम मार्गदर्शक हैं, और पूरी दुनिया उन्हें आध्यात्मिक दिशा पाने के लिए देखती है।
काफ़िरों से घिरा हुआ फिर भी मार्गदर्शन प्राप्त (Surrounded by Infidels Yet Guided)
काफ़िरों से घिरे होने के बावजूद, अल्लाह ने नबी ﷺ को दृढ़ता से मार्गदर्शन की राह पर बनाए रखा, जिससे उनकी ईमानदारी हमेशा बनी रही।
"द्वाल" का अर्थ: अल्लाह की मोहब्बत में गहरे रूप से डूबना (Dwaal as Attraction or Absorption in Divine Love)
सूफी संतों के अनुसार, यहाँ "द्वाल" का अर्थ नबी ﷺ की अल्लाह की मोहब्बत में गहरे रूप से डूबने से है।
मार्गदर्शन यहाँ एक उच्च और अधिक अंतरंग संबंध को दर्शाता है, जो अल्लाह के साथ एक दोस्ताना संबंध (सुलूक) का प्रतीक है।
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से तुलना (Comparison with Hazrat Musa (Peace Be Upon Him))
हज़रत मूसा अल्लाह की रोशन दर्शन को देखकर बेहोश हो गए थे:
"और मूसा बेहोश हो गए" (सूरह अल-अराफ: आयत 143)।
इसके विपरीत, मीराज की रात को, नबी ﷺ ने अल्लाह के सुंदर दर्शन अपनी आँखों से देखे और शांतिपूर्वक बने रहे:
"आँख न तो भटकी, न ही उसने सीमा को पार किया" (सूरह अन-नजम: आयत 17)।
सुलूक (दोस्ताना संबंध) का तोहफा (Granting of Sulook (Cordial Relation))
जब अल्लाह ने नबी ﷺ को अपनी मोहब्बत में गहरे रूप से डूबा हुआ पाया, तो उसने उन्हें सुलूक का दर्जा दिया, जो एक आध्यात्मिक संबंध और अल्लाह के साथ दोस्ती का उच्चतम स्तर है।
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Surah Ayat 7 Tafsir