पवित्र पैग़ंबर ﷺ ने जवाब दिया, यह बताते हुए कि चूंकि उन्होंने अपनी नबूवत (Prophethood) से पहले कभी भी शिर्क (polytheism) नहीं किया था, इसलिए नबूवत (Prophethood) के बाद मूर्तियों (idols) की पूजा करना उनके लिए असंभव था। उस समय के अविश्वासी (infidels) न केवल मूर्तियों (idols) की पूजा करते थे, बल्कि पत्थरों (stones), पेड़ों (trees), तारों (stars), और सादिक व्यक्तियों (pious individuals) की छवियों (images) की भी पूजा करते थे, इसके साथ ही अल्लाह तआला (Allah Almighty) की भी पूजा करते थे। हालांकि, इस्लाम का कानून (law of Islam) ऐसी झूठी देवताओं (false deities) की पूजा (worship) को नकारता है।
इससे हम एक महत्वपूर्ण पाठ (lesson) सीखते हैं: हकीकत (truth) को छिपाना (Taqiyya) इस्लाम की शिक्षाओं (teachings) के खिलाफ है। यहां तक कि ऐसी परिस्थितियों में भी, जब पवित्र पैग़ंबर ﷺ पर दबाव (pressure) डाला जा सकता था या कठिनाइयों (hardship) का सामना करना पड़ सकता था, उन्होंने अपने ईमान (faith) को छिपाया नहीं। इसके बजाय, उन्होंने इसे खुले तौर पर और यकीन (conviction) के साथ प्रकट किया।
यह हमें यह सिखाता है कि मुसलमानों (Muslims) के रूप में, हमें अपनी आस्था (faith) को शब्दों (words) और क्रियाओं (actions) के माध्यम से उजागर (reveal) और बनाए रखना चाहिए, चाहे हालात (circumstances) जैसे भी हों। पवित्र पैग़ंबर ﷺ का उदाहरण (example) हमें प्रेरित करता है कि हम अपने ईमान (faith) में दृढ़ (steadfast) और पारदर्शी (transparent) रहें, यहां तक कि जब हमें विपत्ति (adversity) का सामना करना पड़े।
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Surah Ayat 2 Tafsir