وَلَآ أَنتُمۡ عَٰبِدُونَ مَآ أَعۡبُدُ

Surah Ayat 3 Tafsir


सूरह का संदेश का व्याख्या (Explanation of the Surah's Message):

अल्लाह तआला की इबादत (Worship of Allah Almighty):
यह सूरह स्पष्ट करती है कि अविश्वासी (infidels) अल्लाह तआला के सच्चे भक्त (true worshippers) नहीं हैं, क्योंकि वे मूर्तियों (idols) की पूजा करते हैं, जो अल्लाह तआला की इबादत (worship) नहीं है। अल्लाह तआला की सच्ची इबादत वही है जो पवित्र पैग़ंबर ﷺ की शिक्षाओं (teachings) का पालन करती है। अल्लाह की इबादत में पवित्र पैग़ंबर ﷺ द्वारा निर्धारित नियमों और प्रथाओं (practices) का पालन करना आवश्यक है, न कि अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं (personal preferences) के आधार पर नए अनुष्ठान (rituals) बनाना।

इबादत में नवाचार (Innovation in Worship):
जो व्यक्ति पवित्र पैग़ंबर ﷺ की सुन्नत (Sunnah) को नज़रअंदाज़ (neglect) करता है और व्यक्तिगत इच्छाओं (personal preferences) के आधार पर नई इबादत की विधियाँ (forms of worship) ईजाद (invent) करता है, वह कोई संत (saint) नहीं, बल्कि शैतान (devil) है। इसमें समकालीन लोग भी शामिल हैं, जैसे वे जो वाजिब (obligatory) इबादतों (acts of worship) जैसे सलाह (prayer) और रोज़ा (fasting) की अनदेखी (disregard) करते हैं, फिर भी उन्हें गलत तरीके से संत (saint) या नेक (pious) समझा जाता है। हकीकत यह है कि सच्ची तक़वा (piety) वही है जो पवित्र पैग़ंबर ﷺ के रास्ते पर चले, और कोई भी भटकाव (deviation) गलत (misguided) माना जाता है।

अविवेकपूर्ण अभ्यास जब एकांत में हों (Incorrect Practices in Seclusion):
कुछ धार्मिक व्यक्ति (pious individuals) ऐसे अभ्यासों में शामिल होते हैं जैसे चालीस दिन (Chillah) के लिए एकांत में रहना या अन्य इबादत (worship) जो शरीअत (Shariah) के खिलाफ होती हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोगों ने यह दावा किया कि उन्होंने बारह साल तक एक कुएं में उल्टा लटक कर रहना एक आध्यात्मिक अभ्यास (spiritual practice) है। ऐसे कृत्य इस्लाम द्वारा स्वीकृत (approved) नहीं हैं, क्योंकि सच्ची तक़वा (piety) कभी भी वाजिब इबादतों (obligatory acts of worship) जैसे सलाह (prayer) या सामूहिक (congregational) नमाज़ (prayers) की अनदेखी (neglect) नहीं करती।

मुसलमानों और अविश्वासियों के साथ संबंध (Relationship with Believers and Infidels):
कोई भी मोमिन (believer), चाहे वह हमारे लिए अजनबी (stranger) ही क्यों न हो, हमारे धर्म (faith) में भाई (brother) माना जाता है। हालांकि, कोई भी अविश्वासी (infidel), चाहे वह हमारा अपना बच्चा (child) ही क्यों न हो, हमारे धार्मिक समुदाय में कोई महत्व (status) नहीं रखता। यह इस बात पर जोर देता है कि पूजा का उद्देश्य (object of worship) ही मुख्य अंतर है: हमारी पूजा अल्लाह (Allah) के लिए है, जबकि उनकी पूजा नहीं है। इसलिए, अविश्वासियों (infidels) के साथ शांति (peace) और समझौता (compromise) संभव (possible) नहीं है, क्योंकि हम एक ही पूजा के उद्देश्य (object of worship) को साझा (share) नहीं करते।

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