यह एक किताब है जो आप पर उतारी गई है, अतः इसमें आपके दिल में कोई संकट या संकोच न हो, ताकि आप इसके द्वारा चेतावनी दें, और यह ईमान वालों के लिए एक नसीहत है [2]
किसी रुकावट का न होना का मतलब है कि इसके प्रचार में कोई हिचकिचाहट न हो और काफ़िरों की विरोधी बातों की कोई परवाह न की जाए। यह संबोधन ज़ाहिरा तौर पर रसूल ﷺ से है, लेकिन वास्तव में इसमें पूरी उम्मत के दाई शामिल हैं। क्योंकि रसूल ﷺ ने कभी सत्य और दावत के मामले में हिचकिचाहट या भय नहीं दिखाया। उनका दर्जा इससे बहुत ऊँचा है। बल्कि जिन पर उनकी रूहानी कृपा होती है, वे दुनियावी दबाव से बेपरवाह होकर विश्वास और आत्मबल के साथ संदेश पहुँचाते हैं।
ईमान वालों के लिए नसीहत का मतलब यह है कि कुरआन मुसलमानों को नेक अमल और अख़्लाक़ी सुधार की तरफ़ बुलाता है। काफ़िर इसकी नसीहत के मक़सद नहीं, क्योंकि या तो वे इसे मानते ही नहीं या इसकी असल फ़ायदा सिर्फ़ ईमान वाले ही उठा सकते हैं। दूसरे अर्थ में यह भी हो सकता है कि कुरआन पूरी इंसानियत के लिए है, लेकिन उसकी रूहानी बरकत सिर्फ़ मुसलमानों को हासिल होती है। इस तरह इसमें कोई विरोधाभास नहीं, क्योंकि हिदायत आम है मगर फ़ायदा सिर्फ़ ईमान वालों को मिलता है।
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सूरह अल-आराफ आयत 2 तफ़सीर