कुरान - 5:68 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

قُلۡ يَـٰٓأَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ لَسۡتُمۡ عَلَىٰ شَيۡءٍ حَتَّىٰ تُقِيمُواْ ٱلتَّوۡرَىٰةَ وَٱلۡإِنجِيلَ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكُم مِّن رَّبِّكُمۡۗ وَلَيَزِيدَنَّ كَثِيرٗا مِّنۡهُم مَّآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ مِن رَّبِّكَ طُغۡيَٰنٗا وَكُفۡرٗاۖ فَلَا تَأۡسَ عَلَى ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡكَٰفِرِينَ

अनुवाद -

"कह दो: ऐ एहले-किताब! तुम किसी (दीन) पर नहीं हो जब तक कि तुम तौरात और इंजील और जो कुछ तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम पर नाज़िल हुआ है, उसे क़ायम न करो [204]। और जो तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारी तरफ़ नाज़िल हुआ है, वह उनमें से बहुतों को ज़रूर बग़ावत और कुफ़्र में और बढ़ा देगा [206]। लिहाज़ा तुम काफ़िर लोगों पर ग़म न करो [207]।"

सूरह अल-मायदा आयत 68 तफ़सीर


📖 सूरा अल-माइदा – आयत 68 की तफ़्सीर

 

✅ [204] "तौरात और इंजील को क़ायम करो…"

  • इसका मतलब यह नहीं कि आज की तौरात और इंजील को ज्यों का त्यों अपनाओ, क्योंकि वह तह़रीफ़शुदा (बदलाव) हो चुकी हैं।
  • हकीकत में इसका मतलब है कि उन किताबों के असली हुक्मों को मानो, जिनमें अंतिम रसूल ﷺ की बशारत थी।
  • जब तक रसूलुल्लाह ﷺ पर ईमान नहीं लाओगे, तुम्हारा दीन अधूरा है।

✅ [205] "जो तुम्हारे रब की तरफ़ से नाज़िल हुआ…"

  • इससे मुराद क़ुरआन है, जो सबसे आख़िरी और मुकम्मल किताब है।
  • अब सारे अमल, चाहे वो पिछले दीनों से हों, क़ुरआन के ज़रिए ही परखे जाएंगे

✅ [206] "यह किताब उनमें से बहुतों को कुफ्र में और बढ़ा देगी…"

  • क़ुरआन की असरअंदाज़ी हर दिल पर बराबर नहीं होती।
  • ईमानदारों के लिए ये हिदायत और नूर है, जबकि ज़िद्दी काफ़िरों के लिए ये और ज़्यादा इनकार का ज़रिया बनता है।
  • जैसे बारिश बीज को बढ़ाती है, लेकिन अगर बीज सड़ा हुआ हो तो उसे और बिगाड़ देती है।

✅ [207] "काफ़िरों पर ग़म न करो…"

  • जो लोग दिल से इंकार पर अड़े हुए हैं, उनके लिए ग़म करना बेकार है।
  • रसूलुल्लाह ﷺ को तसल्ली दी गई कि आपकी ज़िम्मेदारी सिर्फ पहुंचाना है, हिदायत देना अल्लाह का काम है।

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