कुरान - 4:91 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

سَتَجِدُونَ ءَاخَرِينَ يُرِيدُونَ أَن يَأۡمَنُوكُمۡ وَيَأۡمَنُواْ قَوۡمَهُمۡ كُلَّ مَا رُدُّوٓاْ إِلَى ٱلۡفِتۡنَةِ أُرۡكِسُواْ فِيهَاۚ فَإِن لَّمۡ يَعۡتَزِلُوكُمۡ وَيُلۡقُوٓاْ إِلَيۡكُمُ ٱلسَّلَمَ وَيَكُفُّوٓاْ أَيۡدِيَهُمۡ فَخُذُوهُمۡ وَٱقۡتُلُوهُمۡ حَيۡثُ ثَقِفۡتُمُوهُمۡۚ وَأُوْلَـٰٓئِكُمۡ جَعَلۡنَا لَكُمۡ عَلَيۡهِمۡ سُلۡطَٰنٗا مُّبِينٗا

अनुवाद -

अब तुम कुछ और ऐसे लोगों को पाओगे जो चाहते हैं कि तुमसे भी सलामत रहें और अपनी क़ौम से भी सलामत रहें [287]। मगर जब भी उन्हें फ़साद (शरारत) की तरफ़ बुलाया जाता है [288], तो वे बिना हिचकिचाहट उसमें कूद पड़ते हैं। अगर वे तुमसे किनारा न करें, सुलह का पैग़ाम न दें और अपने हाथ (हमला) से न रोकें, तो उन्हें पकड़ लो और जहाँ पाओ, क़त्ल कर दो [290]। ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ हमने तुम्हें खुला सबूत और इख़्तियार दे दिया है [291]।

सूरह अन-निसा आयत 91 तफ़सीर


📖 सूरा अन-निसा – आयत 91 की तफ़्सीर

 

✅ [287] दोहरी सुरक्षा चाहने वाले

यह उन लोगों का ज़िक्र है जो चाहते हैं कि मुसलमानों से भी बचे रहें और अपने काफ़िर क़ौम से भी। इनका मक़सद सच्ची तटस्थता नहीं होता, बल्कि दोनों तरफ़ से फ़ायदा उठाना और टकराव से बचकर अपने स्वार्थ पूरे करना होता है। शुरू में लग सकता है कि ये लड़ाई से दूर रहना चाहते हैं, मगर आगे की आयत में इनकी असलियत खुल जाती है।

✅ [288] शरारत में लौटने की आदत

जब भी काफ़िर इन्हें ग़द्दारी या जंग की तरफ़ बुलाते हैं, ये बिना देर लगाए उसमें शामिल हो जाते हैं। इससे इनका निफ़ाक़ (दोहरा चेहरा) और बेईमानी साबित होती है, और यह साफ़ हो जाता है कि इनका अमन का दावा धोखा है।

✅ [290] जंग का आख़िरी और पक्का हुक्म

अगर ऐसे लोग:

  • दुश्मनी से किनारा न करें,
  • सुलह की पेशकश न करें,
  • मुसलमानों को नुकसान पहुँचाने से न रुकें—

तो हुक्म है: "जहाँ पाओ, क़त्ल कर दो"
इससे मालूम हुआ:

  • यह आयत पहले की नर्मी वाली आयतों को मंसूख़ कर देती है।
  • पवित्र महीनों (रजब, शव्वाल, ज़िलक़ादा, ज़िलहिज्जा) में जंग की मनाही भी इससे ख़त्म हुई।
  • अब मुसलमानों को ऐसे दुश्मन काफ़िरों से हर वक़्त और हर जगह लड़ने की इजाज़त है।
  • यह हुक्म क़यामत तक बाक़ी है और कोई इसे मंसूख़ नहीं कर सकता।
  • जो लोग जिहाद को मंसूख़ मानते हैं, जैसे क़ादियानी, वे इस्लाम से बाहर हैं।

✅ [291] काफ़िरों की क़ानूनी क़िस्में

यह आयत काफ़िरों को अलग-अलग वर्गों में बांटती है:

  1. ग़ैर-मुस्लिम नागरिक जो मुस्लिम हुकूमत में रहते हैं – इन्हें नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा।
  2. पनाह माँगने वाले शरणार्थी – इन्हें सुरक्षा दी जाएगी।
  3. अस्थायी मुआहिद (संधि-भागीदार) – जब तक मुआहिदा क़ायम है, उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा।
  4. दुश्मन काफ़िर जिनसे कोई मुआहिदा नहीं – उनसे हर समय लड़ना जायज़ है।

यह उसूल मुसलमानों को जंग में भी इंसाफ़ और अनुशासन का तरीका सिखाता है, ताकि हर क़दम इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ हो।

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