कुरान - 2:136 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

قُولُوٓاْ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيۡنَا وَمَآ أُنزِلَ إِلَىٰٓ إِبۡرَٰهِـۧمَ وَإِسۡمَٰعِيلَ وَإِسۡحَٰقَ وَيَعۡقُوبَ وَٱلۡأَسۡبَاطِ وَمَآ أُوتِيَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَمَآ أُوتِيَ ٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمۡ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّنۡهُمۡ وَنَحۡنُ لَهُۥ مُسۡلِمُونَ

अनुवाद -

"कह दो (ऐ मुसलमानो): हम ईमान लाए अल्लाह पर, और उस पर जो हम पर नाज़िल किया गया, और उस पर जो इबराहीम, इस्माईल, इस्हाक़ [271], याक़ूब और उनकी औलाद [272] पर नाज़िल किया गया, और जो मूसा और ईसा को दिया गया, और जो दूसरे नबियों [273] को उनके रब की तरफ़ से दिया गया। हम उनमें से किसी के दर्मियान ईमान में कोई फ़र्क़ नहीं करते [274], और हम उसी के फरमांबरदार हैं।"

सूरह अल-बक़रा आयत 136 तफ़सीर


[271] "जो इबराहीम, इस्माईल, इस्हाक़ पर नाज़िल किया गया..."

  • इस हिस्से में बताया गया कि ये तमाम अज़ीम नबी — इबराहीम, इस्माईल, इस्हाक़ और याक़ूबएक ही पैग़ाम लेकर आए थे।
  • इब्राहीम (अ.स.) को सहीफ़े (Divine Scrolls) मिले थे और इस्माईल व इस्हाक़ (अ.स.) ने वही दीन लोगों तक पहुँचाया।
  • यह आयत इस बात पर ज़ोर देती है कि इस्लाम का पैग़ाम कोई नया नहीं, बल्कि पहले नबियों का ही सिलसिला है।

[272] "और उनकी औलाद पर..."

  • "औलाद" से मुराद है हज़रत याक़ूब (अ.स.) की नस्ल, जिनमें से कई नबी हुए — जैसे हज़रत यूसुफ़ (अ.स.) और उनके भाई।
  • बहुत से उलमा का मानना है कि इस हिस्से से ये साबित होता है कि हज़रत याक़ूब की तमाम औलाद भी नबी थे, क्योंकि उन्हें नबियों की फहरिस्त में शामिल किया गया है।
  • यह उनकी बरकतों वाली नस्ल की निशानी है।

[273] "और जो दूसरे नबियों को उनके रब की तरफ़ से दिया गया..."

  • इस हिस्से में बताया गया कि मुसलमान सिर्फ़ चंद मशहूर नबियों पर नहीं, बल्कि हर उस नबी पर ईमान लाते हैं जिसे अल्लाह ने भेजा।
  • चाहे हमें उनका नाम मालूम हो या नहीं — हर नबी असली और अल्लाह की तरफ़ से भेजा गया है।
  • इस्लाम हमें सिखाता है कि नबियों की तादाद गिनना ज़रूरी नहीं, ईमान लाना ज़रूरी है।

[274] "हम उनमें से किसी के दर्मियान ईमान में कोई फ़र्क़ नहीं करते..."

  • यहाँ इस्लामी अक़ीदे का एक बुनियादी उसूल बताया गया है:
    हर नबी पर बराबर ईमान रखना फ़र्ज़ है।
  • कोई भी नबी झूठा या कमतर नहीं — सब सच्चे, रब के पसंदीदा, और रहनुमा हैं।
  • हाँ, अल्लाह ने खुद कुछ नबियों को दूसरों से ऊँचा दर्जा दिया है — लेकिन इंसानों को ईमान में फ़र्क़ करने का हक़ नहीं

📌 नोट:
जो कोई भी एक नबी को भी ना माने — वो काफ़िर कहलाता है। चाहे वो हज़रत ईसा (अ.स.) हों, हज़रत मूसा (अ.स.) हों या किसी और को न माने।

🌟 इस आयत से मिलने वाले अहम सबक़:

1. तमाम नबियों पर यकसां ईमान:
इस्लाम हमें सिखाता है कि हर नबी पर एक जैसे ईमान लाया जाए — ना किसी को छोटा समझा जाए, ना किसी को छोड़ा जाए।

2. दीन की असलियत व सिलसिला:
इस्लाम कोई नया मज़हब नहीं, बल्कि वही पुराना हक़ का रास्ता है, जो पहले नबियों ने सिखाया।

3. नाम नहीं, काम देखो:
जरूरी नहीं कि हर नबी का नाम हमें मालूम हो — लेकिन ईमान सभी पर ज़रूरी है।

4. फ़र्माबरदारी (Submission):
इस आयत के आख़िर में कहा गया: "और हम उसी के फरमांबरदार हैं" — यानी सिर्फ़ मानना नहीं, अल्लाह की बातों पर अमल करना भी ज़रूरी है।

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