"कह दो (ऐ मुसलमानो): हम ईमान लाए अल्लाह पर, और उस पर जो हम पर नाज़िल किया गया, और उस पर जो इबराहीम, इस्माईल, इस्हाक़ [271], याक़ूब और उनकी औलाद [272] पर नाज़िल किया गया, और जो मूसा और ईसा को दिया गया, और जो दूसरे नबियों [273] को उनके रब की तरफ़ से दिया गया। हम उनमें से किसी के दर्मियान ईमान में कोई फ़र्क़ नहीं करते [274], और हम उसी के फरमांबरदार हैं।"
📌 नोट:
जो कोई भी एक नबी को भी ना माने — वो काफ़िर कहलाता है। चाहे वो हज़रत ईसा (अ.स.) हों, हज़रत मूसा (अ.स.) हों या किसी और को न माने।
1. तमाम नबियों पर यकसां ईमान:
इस्लाम हमें सिखाता है कि हर नबी पर एक जैसे ईमान लाया जाए — ना किसी को छोटा समझा जाए, ना किसी को छोड़ा जाए।
2. दीन की असलियत व सिलसिला:
इस्लाम कोई नया मज़हब नहीं, बल्कि वही पुराना हक़ का रास्ता है, जो पहले नबियों ने सिखाया।
3. नाम नहीं, काम देखो:
जरूरी नहीं कि हर नबी का नाम हमें मालूम हो — लेकिन ईमान सभी पर ज़रूरी है।
4. फ़र्माबरदारी (Submission):
इस आयत के आख़िर में कहा गया: "और हम उसी के फरमांबरदार हैं" — यानी सिर्फ़ मानना नहीं, अल्लाह की बातों पर अमल करना भी ज़रूरी है।
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सूरह अल-बक़रा आयत 136 तफ़सीर