155. "और हम ज़रूर तुम्हें आज़माएँगे [329] कुछ डर, भूख, और माल, जानों और फलों के नुक़सान से। और सब्र करने वालों को खुशखबरी दे दो।"
सूरह अल-बक़रा आयत 155 तफ़सीर
[329] इम्तिहान का तरीका और उसका मक़सद
इस आयत में अल्लाह तआला बता रहे हैं कि मोमिनों (ईमान वालों) को दुनिया में अलग-अलग तरीक़ों से आज़माया जाएगा, ताकि उनके सब्र, ईमान और भरोसे की हक़ीक़त सामने आए।
➤ डर (ख़ौफ़):
ये डर अल्लाह की सज़ा का, इबादत में कमी का, या किसी नुकसान का हो सकता है।
➤ भूख:
ये भूख कभी रमज़ान के रोज़ों के रूप में होती है, और कभी दुनियावी परेशानियों से।
यह सब्र और इताअत (आज्ञा) का इम्तिहान है।
➤ माल का नुक़सान:
जैसे व्यापार में घाटा, चोरी, या ज़कात देने से माल की कमी — ये सब अल्लाह की राह में कुर्बानी का हिस्सा हैं।
➤ जानों का नुक़सान:
अपने प्यारे लोगों की मौत — जैसे बच्चे, माता-पिता, जीवनसाथी — ये सबसे बड़ी तकलीफ़ों में से होती है।
➤ फलों का नुक़सान:
इसका मतलब है:
फ़सल का नुक़सान,
या इंसान की मेहनत के नतीजों का चला जाना,
यानी ऐसी चीज़ें जो इंसान ने मेहनत से पाई हों, उनका ज़ाया हो जाना।
सब्र करने वालों को बशारत (खुशखबरी)
अल्लाह फ़रमाता है: "और सब्र करने वालों को खुशखबरी दे दो" — यानी जो लोग इन सब इम्तिहानों में थमे रहते हैं, शिकायत नहीं करते, और अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, उनके लिए अल्लाह के पास बेहिसाब अज्र (इनाम) है।
ये बताता है कि दुनियावी तकलीफ़ें, मोमिन के लिए सिर्फ़ इम्तिहान हैं, और सब्र करने वाला कामयाब है।
सूरह अल-बक़रा आयत 155 तफ़सीर