कुरान - 2:155 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

وَلَنَبۡلُوَنَّكُم بِشَيۡءٖ مِّنَ ٱلۡخَوۡفِ وَٱلۡجُوعِ وَنَقۡصٖ مِّنَ ٱلۡأَمۡوَٰلِ وَٱلۡأَنفُسِ وَٱلثَّمَرَٰتِۗ وَبَشِّرِ ٱلصَّـٰبِرِينَ

अनुवाद -

155. "और हम ज़रूर तुम्हें आज़माएँगे [329] कुछ डर, भूख, और माल, जानों और फलों के नुक़सान से। और सब्र करने वालों को खुशखबरी दे दो।"

सूरह अल-बक़रा आयत 155 तफ़सीर


[329] इम्तिहान का तरीका और उसका मक़सद

  • इस आयत में अल्लाह तआला बता रहे हैं कि मोमिनों (ईमान वालों) को दुनिया में अलग-अलग तरीक़ों से आज़माया जाएगा, ताकि उनके सब्र, ईमान और भरोसे की हक़ीक़त सामने आए।

डर (ख़ौफ़):

  • ये डर अल्लाह की सज़ा का, इबादत में कमी का, या किसी नुकसान का हो सकता है।

भूख:

  • ये भूख कभी रमज़ान के रोज़ों के रूप में होती है, और कभी दुनियावी परेशानियों से।
  • यह सब्र और इताअत (आज्ञा) का इम्तिहान है।

माल का नुक़सान:

  • जैसे व्यापार में घाटा, चोरी, या ज़कात देने से माल की कमी — ये सब अल्लाह की राह में कुर्बानी का हिस्सा हैं।

जानों का नुक़सान:

  • अपने प्यारे लोगों की मौत — जैसे बच्चे, माता-पिता, जीवनसाथी — ये सबसे बड़ी तकलीफ़ों में से होती है।

फलों का नुक़सान:

  • इसका मतलब है:
    • फ़सल का नुक़सान,
    • या इंसान की मेहनत के नतीजों का चला जाना,
    • यानी ऐसी चीज़ें जो इंसान ने मेहनत से पाई हों, उनका ज़ाया हो जाना।

सब्र करने वालों को बशारत (खुशखबरी)

  • अल्लाह फ़रमाता है: "और सब्र करने वालों को खुशखबरी दे दो" — यानी जो लोग इन सब इम्तिहानों में थमे रहते हैं, शिकायत नहीं करते, और अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, उनके लिए अल्लाह के पास बेहिसाब अज्र (इनाम) है।
  • ये बताता है कि दुनियावी तकलीफ़ें, मोमिन के लिए सिर्फ़ इम्तिहान हैं, और सब्र करने वाला कामयाब है।

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