कुरान - 2:93 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

وَإِذۡ أَخَذۡنَا مِيثَٰقَكُمۡ وَرَفَعۡنَا فَوۡقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُواْ مَآ ءَاتَيۡنَٰكُم بِقُوَّةٖ وَٱسۡمَعُواْۖ قَالُواْ سَمِعۡنَا وَعَصَيۡنَا وَأُشۡرِبُواْ فِي قُلُوبِهِمُ ٱلۡعِجۡلَ بِكُفۡرِهِمۡۚ قُلۡ بِئۡسَمَا يَأۡمُرُكُم بِهِۦٓ إِيمَٰنُكُمۡ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ

अनुवाद -

[93] और (याद करो) जब हमने तुमसे वचन लिया और तुम्हारे ऊपर तौर पहाड़ को उठाया, (कहा गया): "जो कुछ हमने तुम्हें दिया है, उसे मज़बूती से पकड़ो और सुनो।" उन्होंने कहा: "हमने सुना, लेकिन हमने अवज्ञा की।" [177] और उनके दिल बछड़े (की पूजा) में रम गए उनके कुफ्र की वजह से। [178] कह दो, "बहुत बुरा है वह जो तुम्हारा ईमान तुम्हें करने को कहता है, अगर तुम सच्चे ईमान वाले हो।" [179]

सूरह अल-बक़रा आयत 93 तफ़सीर


[177] वचन लेने के बावजूद नाफरमानी और ज़ाहिरी कबूलियत का हुक्म

इस आयत से कुछ अहम बातें मालूम होती हैं:

  • एक बार जब कोई ईमान लाता है, तो उसे फिर से कुफ्र अपनाने की इजाज़त नहीं।
  • बनी इसराईल ने तौरात को मानकर फिर इन्कार की कोशिश की, तो उन्हें मौत की सज़ा दी गई।
  • शरीअत ज़ाहिरी अल्फ़ाज़ और कामों के अनुसार हुक्म देती है, दिल की बात पर नहीं।
  • जब उन्होंने "हमने सुना" कहा, मगर दिल से इंकार किया, तब भी तौर पहाड़ को उठाया गया।
  • डर या मजबूरी में ईमान कबूल करना तब तक काफ़ी नहीं जब तक दिल से सच्चा ईमान न हो।

[178] दिल की ख्वाहिशें बताती हैं ईमान या कुफ्र की हालत

बनी इसराईल के दिल बछड़े की पूजा में रम गए थे। इससे पता चलता है कि उनका अंदरूनी ईमान कमज़ोर था।

  • जो शख़्स गुनाह और गुमराही की तरफ़ झुका रहता है, वो अंदर से कुफ्र में डूबा हुआ होता है।
  • जो नेकी, परहेज़गारी और नेक लोगों से मुहब्बत रखता है, वो सच्चा मोमिन होता है।
  • हर इंसान को अपने दिल की ख्वाहिशें देख कर अपने ईमान का जायज़ा लेना चाहिए।

[179] झूठे ईमान पर तंज और हकीकत का इज़हार

इस आयत में "ईमान" शब्द तंज के तौर पर इस्तेमाल हुआ है।

  • अल्लाह फ़रमा रहा है: अगर तुम्हारा ईमान तुम्हें बछड़े की पूजा और नबियों का इनकार करने को कहता है, तो ऐसा ईमान कुफ्र से बदतर है।
  • ऐसा ईमान महज़ नाम का है, हकीकत में वह गुमराही और इंकार है।
  • जो काम कुफ्र से भरे हों, वो कभी भी सच्चे ईमान की निशानी नहीं हो सकते।

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