कुरान - 2:70 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

قَالُواْ ٱدۡعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِيَ إِنَّ ٱلۡبَقَرَ تَشَٰبَهَ عَلَيۡنَا وَإِنَّآ إِن شَآءَ ٱللَّهُ لَمُهۡتَدُونَ

अनुवाद -

[70] उन्होंने कहा: "अपने रब से हमारे लिए दुआ करो कि वह हमें साफ़ बता दे कि वह कैसी (गाय) हो। बेशक हमें सारी गायें एक जैसी लगती हैं।" [127] "और इंशा-अल्लाह, हम जरूर हिदायत पा लेंगे।" [128]

सूरह अल-बक़रा आयत 70 तफ़सीर


[127] गाय की पहचान को लेकर बेवजह उलझाव

  • उन्होंने फिर कहा: "हमें साफ़ बताओ कैसी गाय है?"
  • बनी इस्राईल को पहले ही कई बार जवाब मिल चुका था — उम्र भी बताई गई, रंग भी बताया गया।
  • फिर भी उन्होंने कहा: "हमें तो सारी गायें एक जैसी लगती हैं", यानी अब भी उलझन दिखा रहे हैं

🔹 यह उनके हिचकिचाने वाले रवैये और अल्लाह के हुक्म को टालने की आदत को दर्शाता है।

[128] इंशा-अल्लाह कहने की अहमियत

  • उन्होंने आख़िर में कहा: "अगर अल्लाह चाहे (इंशा-अल्लाह), तो हम हिदायत पा लेंगे।"
  • इस से दो बातें सीखने को मिलती हैं:
    1. कोई भी काम करने का इरादा हो, तो ज़रूर कहना चाहिए: "इंशा-अल्लाह" (अगर अल्लाह चाहे)
    2. लेकिन इंशा-अल्लाह का इस्तेमाल सिर्फ अच्छे और जायज़ (हलाल) कामों के लिए करना चाहिए, बुरे कामों के लिए नहीं

📝 मिसाल:
❌ ग़लत: "अगर अल्लाह चाहे, मैं चोरी करूँगा।"
✅ सही: "अगर अल्लाह चाहे, मैं नमाज़ पढ़ूँगा।"

🌟 सीख:

  • अल्लाह का हुक्म जैसे ही समझ में आए, उस पर तुरंत अमल करना चाहिए
  • बार-बार सवाल और बहाने बनाने से काम मुश्किल हो जाता है।
  • और हमेशा कहना चाहिए: "इंशा-अल्लाह", क्योंकि हर चीज़ अल्लाह की मर्ज़ी से होती है

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