कुरान - 2:59 सूरह अल-बक़रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

فَبَدَّلَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ قَوۡلًا غَيۡرَ ٱلَّذِي قِيلَ لَهُمۡ فَأَنزَلۡنَا عَلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ رِجۡزٗا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُواْ يَفۡسُقُونَ

अनुवाद -

[59] लेकिन ज़ालिमों ने उस बात को बदल डाला [106] उस चीज़ के अलावा किसी और बात से जो उनसे कही गई थी। तो हमने उनके ऊपर आसमान से एक आज़ाब [वबा] [107] भेजा, क्योंकि वे हुक्म से खुले तौर पर नाफरमानी कर रहे थे।

सूरह अल-बक़रा आयत 59 तफ़सीर


🔹 [106] मुक़द्दस अल्फ़ाज़ को बदलना बहुत बड़ा गुनाह है

इस आयत में बताया गया कि बनी इसराईल को एक ख़ास अल्फ़ाज़ — "हित्ततुन" (हमें माफ़ कर दे) — कहने को कहा गया था,
मगर उन्होंने उसे बदलकर मज़ाकिया लहजे में "हिन्ततुन" (यानि 'गेहूँ दो') कह दिया।

👉 अल्लाह के दिए हुए अल्फ़ाज़, जैसे दुरूद, वज़ीफ़े या कलिमे,
शैख़ या पैग़म्बर की बताई हुई शक्ल में ही पढ़ने चाहिए।
इन्हें बदलना, काटना, या मज़ाक़ बनाना — ज़ालिमी और गुस्ताख़ी है।

🔹 [107] वबा के रूप में अल्लाह का अज़ाब

इस गुस्ताख़ी की वजह से अल्लाह ने आसमान से एक वबा (plague) भेजी —
जिसके नतीजे में 24,000 बनी इसराईल फौरन हलाक हो गए।

👉 हदीसों में आता है कि:

  • जिस जगह वबा फैली हो, वहाँ जाना नहीं चाहिए
  • और अगर किसी की जगह पर वबा आ जाए, तो वहाँ से भागना नहीं चाहिए
    यानी सब्र और तवक्कुल के साथ अल्लाह से रहमत मांगनी चाहिए।

📌 यह आयत हमें बताती है कि:

ना-फ़रमानी, गुनाहों की बढ़ोतरी, और अल्फ़ाज़ की बेहुरमती — ये सब बड़ी आफ़तों और बिमारियों का कारण बनते हैं।

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