15. अल्लाह उनका मज़ाक उड़ाता है [30] और उन्हें उनकी सरकशी में भटकने के लिए छोड़ देता है [31]।
अल्लाह उनके मज़ाक का बदला सज़ा देकर देता है।
इस्लाम की इज़्ज़त को गिराने की इनकी कोशिश का नतीजा — अल्लाह का साफ़ और सख़्त इंतेक़ाम (बदला) — इस आयत में बयान हुआ है।
इस आयत में उन लोगों को बेनक़ाब किया गया है जो हालात के हिसाब से दोहरा चेहरा रखते हैं — जब फ़ायदा हो, तो मुसलमानों के साथ दिखते हैं, लेकिन जब काफ़िरों (धनवान या असरदार) के बीच होते हैं, तो उनका साथ देते हैं।
अक्सर गैर-ईमान वालों की सोहबत (संगत), ख़ासतौर पर उनकी तारीफ़ या झुकाव की वजह से, दिल में मुनाफ़िक़त (दोमुंही) पैदा होती है।
अल्लाह मोमिनों को सुकून, समझ और सफ़ाई देता है, लेकिन मुनाफ़िक़ उलझे रहते हैं —
रूहानी अंधेरे (spiritual darkness) और भीतरी टकराव (internal conflict) में भटकते रहते हैं।
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सूरह अल-बक़रा आयत 15 तफ़सीर